शिलान्यास से पहले जानें वास्तु पुरुष मंडल का महत्व

प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला के प्रणेता ऋषियों ने मंदिरों को केवल पत्थर और मोर्टार का ढांचा नहीं, बल्कि ब्रह्मांड का सूक्ष्म प्रतिबिंब और दिव्य ऊर्जा का केंद्र माना। इस दार्शनिक एवं आध्यात्मिक चिंतन का मूर्त रूप है वास्तु पुरुष मंडल, जिसे वास्तु पद विन्यास के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर निर्माण का वह ज्यामितीय एवं प्रतीकात्मक आधार है जो अदृश्य को दृश्यमान बनाता है।

१. निराकार से साकार का स्वरूप: सागर को बिंदु में समाना

ब्रह्म या परम सत्ता निराकार है—अनंत, अवर्णनीय। मंदिर निर्माण की कला का परम लक्ष्य इसी निराकार तत्व को स्थापत्य के माध्यम से एक साकार, मूर्त स्वरूप देना है। वास्तु पुरुष मंडल इसी साधना का माध्यम है। यह किसी साधारण नक्शे या ग्रिड से कहीं अधिक है; यह एक आध्यात्मिक ‘ब्लूप्रिंट’ है जो समस्त ब्रह्मांडीय ऊर्जा को एक निर्धारित स्थान (मंदिर) में समेटने का प्रयास करता है। प्राचीन ग्रंथों में इसकी तुलना “सागर को बिंदु में समाने” जैसी महान उपलब्धि से की गई है—अर्थात्, अनंत को एक सीमित क्षेत्र में प्रतिष्ठित करना।

यह विचार मंदिर को एक यन्त्र या मंडल के रूप में स्थापित करता है, जहाँ निर्मित स्थान स्वयं ही साधना का मार्ग और सिद्धि का साधन बन जाता है। मंदिर का हर पत्थर, हर स्तंभ और हर शिखर किसी गहन सिद्धांत का प्रतीक है, और यह सब वास्तु मंडल से ही प्रारंभ होता है।

२. आध्यात्मिक ग्रिड और देवताओं का स्थान: दिशाओं में विराजमान देवता

वास्तु पुरुष मंडल का केंद्रीय सिद्धांत भूमि को समान आयतों या वर्गों (पदों) के एक जाल (ग्रिड) में विभाजित करना है। प्रत्येक पद एक विशिष्ट दिव्य शक्ति या देवता का प्रतिनिधित्व करता है। इस प्रकार, पूरा मंदिर परिसर एक जीवंत, सजीव मंडल बन जाता है, जहाँ हर कोना किसी देवता का निवास स्थान है।

• ब्रह्म स्थान: मंडल का अंतरतम केंद्र

मंडल के सबसे मध्य के पदों को ब्रह्म स्थान कहा जाता है, जो सृष्टि के सृजनकर्ता ब्रह्मा के लिए आरक्षित होता है। यह स्थान निर्माण का आध्यात्मिक केंद्र है, जहाँ से समस्त ऊर्जा का संचार होता है। विभिन्न प्रकार के मंडलों में ब्रह्म स्थान का क्षेत्र भिन्न होता है:

  • ६४ पद भद्रक वास्तु में, केंद्र के ४ पद ब्रह्मा के लिए निर्धारित हैं।
  • ८१ पद कामद वास्तु में, मध्य के ९ पद ब्रह्मा का स्थान होते हैं।
    यह केंद्र पूर्णता, शांति और सृजनात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। यहाँ कोई भारी निर्माण या स्तंभ नहीं होता, जिससे यह ऊर्जा बिना रुकावट के प्रवाहित हो सके।

• दिशाओं के देवता: ब्रह्मांडीय रक्षक और पोषक

मंडल के शेष पद विभिन्न दिशाओं और उपदिशाओं (कोणों) के देवताओं को समर्पित होते हैं। ये देवता न केवल मंदिर की रक्षा करते हैं, बल्कि भक्तों को विशिष्ट फल भी प्रदान करते हैं। कुछ प्रमुख आवंटन इस प्रकार हैं:

  • ईशान कोण (उत्तर-पूर्व): इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है। यहाँ ‘आप’ (जल के देवता) और ‘आपवत्स’ का स्थान होता है। यह कोण ज्ञान, शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है।
  • अग्नि कोण (दक्षिण-पूर्व): यहाँ ‘सावित्र’ (सूर्य देवता) का आवास होता है। यह ऊर्जा, उत्साह और कर्मशक्ति का स्रोत है।
  • नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम): इस कोण का स्वामी ‘इंद्र’ है, जो शक्ति, समृद्धि और वर्षा के देवता हैं।
  • वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम): यहाँ ‘रुद्र’ (शिव के रौद्र रूप) का स्थान होता है, जो परिवर्तन, संहार और पुनर्निर्माण के प्रतीक हैं।
    इसी प्रकार, अन्य पदों पर दिक्पाल (दिशाओं के रक्षक) जैसे इंद्र (पूर्व), यम (दक्षिण), वरुण (पश्चिम), और कुबेर (उत्तर) सहित अनेकानेक वैदिक एवं पौराणिक देवताओं (जैसे पर्जन्य, जय, महेंद्र, अदिति, सूर्य, भृंगराज) का आवास निश्चित किया गया है।

इस रूपरेखा के अनुसार निर्मित मंदिर केवल एक इमारत नहीं रह जाता; वह समस्त ब्रह्मांडीय शक्तियों का एक सजीव, स्पंदनशील निवास स्थान बन जाता है।

३. वास्तु के प्रकार: भद्रक और कामद वास्तु

प्राचीन स्तंभ-ग्रंथों (वास्तु शास्त्र) में विभिन्न प्रयोजनों के लिए अलग-अलग मंडलों का वर्णन है। मंदिर निर्माण के लिए प्रमुखतः दो प्रकार के वास्तु मंडल प्रसिद्ध हैं:

• ६४ पद भद्रक वास्तु

यह मंडल 8×8 के ग्रिड में विभाजित होता है, जिसमें कुल 64 पद होते हैं। इसका उपयोग मध्यम आकार के मंदिरों या विशिष्ट पवित्र स्थलों के निर्माण में किया जाता था। इसमें सटीकता और सादगी का समन्वय है। मध्य के चार पद ब्रह्म स्थान बनाते हैं, जो एक सशक्त और केंद्रित ऊर्जा क्षेत्र का निर्माण करते हैं।

• ८१ पद कामद वास्तु

यह अधिक जटिल और विस्तृत मंडल है, जो 9×9 के ग्रिड में बंटा होता है और 81 पदों से मिलकर बनता है। इसका प्रयोग बड़े और भव्य मंदिर परिसरों, राजप्रासादों या अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों के निर्माण में होता था। 81 की संख्या (9×9) पूर्णता और ब्रह्मांडीय व्यवस्था का प्रतीक है। इसमें मध्य के नौ पद ब्रह्म स्थान के रूप में और अधिक विस्तृत क्षेत्र को समर्पित करते हैं, जिससे ऊर्जा का प्रवाह अधिक सूक्ष्म और स्तरीय हो जाता है।

ये मंडल केवल आरेख नहीं हैं; ये स्थान की ‘ज्योतिषीय अनुकूलता’ और ‘दिव्य संरचना’ को सुनिश्चित करने के वैज्ञानिक (आध्यात्मिक दृष्टि से) सूत्र हैं।

४. शिलान्यास और पूजन विधि: परंपरा का प्राण

वास्तु पुरुष मंडल केवल कागज पर खींचा गया चित्र नहीं है; इसका वास्तविक जीवन में अवतरण एक पवित्र और विस्तृत अनुष्ठान के माध्यम से होता है, जिसे ‘वास्तु पूजा’ और ‘शिलान्यास विधि’ कहा जाता है। यह प्रक्रिया वैदिक काल से चली आ रही एक सनातन परंपरा है।

मंदिर निर्माण का प्रथम चरण भूमि का शोधन और शांति-पूजन है। इसके बाद, चुने हुए भूखंड पर वास्तु मंडल की रेखाएँ खींची जाती हैं। फिर ‘वास्तु बलि’ या ‘वास्तु होम’ का आयोजन किया जाता है। इस अनुष्ठान में, मंडल के मर्म स्थानों (जैसे केंद्र और विभिन्न कोणों के पद) पर विधिवत पूजन करके उन स्थानों पर विराजमान देवताओं का आह्वान और प्रतिष्ठा किया जाता है।

इसके पश्चात ही शिलान्यास—अर्थात् पहली शिला या आधारशिला की स्थापना—की जाती है। यह शिला प्रायः मंदिर के गर्भगृह के केंद्र (ब्रह्म स्थान के नीचे) में रखी जाती है। यह सम्पूर्ण प्रक्रिया इस विश्वास पर आधारित है कि मंदिर का निर्माण पहले दिव्य लोक में, देवताओं के सान्निध्य में होता है, और उसके बाद ही भौतिक लोक में उसका रूप ग्रहण करता है।

संक्षेप: देव प्रासाद का आध्यात्मिक आधार

निष्कर्षतः, वास्तु पुरुष मंडल मंदिर निर्माण कला का हृदय और आत्मा है। यह एक साधारण योजना नहीं, बल्कि वह आध्यात्मिक आधारशिला है जिस पर ‘देव प्रासाद’ अर्थात् देवताओं का निवास स्थान खड़ा होता है। इसकी प्रत्येक रेखा और प्रत्येक पद एक गहन दार्शनिक संकल्पना का प्रतिनिधित्व करता है, जो मंदिर को सिर्फ एक भवन से उठाकर एक सक्रिय आध्यात्मिक यन्त्र बना देता है।

ऐसे मंडल पर निर्मित मंदिर मनुष्य को न केवल धार्मिक शांति प्रदान करता है, बल्कि जीवन के चारों पुरुषार्थ—धर्म (नैतिकता), अर्थ (समृद्धि), काम (कर्म एवं इच्छापूर्ति) और मोक्ष (मुक्ति)—की प्राप्ति का मार्ग भी प्रशस्त करता है। यही कारण है कि हजारों वर्षों बाद भी भारतीय स्थापत्य की यह प्राचीन विद्या अपना तेज और प्रासंगिकता बनाए हुए है, और मंदिरों को केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि जीवंत ऊर्जा के केंद्र के रूप में स्थापित करती है।

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Written by

RK Sompura

Mr. RK Sompura is a renowned personality in the Hindu and Jain Nagar Sheli temple architecture and construction industry. He carries forward a rich legacy of ancestral knowledge in temple design, building, and renovation, passed down through generations of his family. With his deep expertise and dedication, he has contributed to the construction of multiple magnificent temple structures across various parts of India, preserving traditional craftsmanship while enhancing the spiritual and architectural heritage of the region.